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Maa Shayari

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Share kro jisse aap baat krte ho or jisse nhi krte…

कल माँ की गोद में, आज मौत की आग़ोश में,
हम को दुनिया में ये दो वक़्त बड़े सुहाने से मिले।

है गरीब मेरी माँ फिर भी मेरा ख्याल रखती है,
मेरे लिए रोटी और अपने लिए पतीले की खुरचन रखती है।

बालाएं आकर भी मेरी चौखट से लौट जाती हैं,
मेरी माँ की दुआएं भी कितना असर रखती हैं।

वो उजला हो के मैला हो या मँहगा हो के सस्ता हो,
ये माँ का सर है इस पे हर दुपट्टा मुस्कुराता है।

बहुत बेचैन हो जाता है जब कभी दिल मेरा,
मैं अपने पर्स में रखी माँ की तस्वीर को देख लेता हूँ।

बेसन की रोटी पर, खट्टी चटनी सी माँ…
याद आती है चौका, बासन, चिमटा, फूंकनी जैसी माँ।

शहर में आ कर पढ़ने वाले ये भूल गए,
किस की माँ ने कितना ज़ेवर बेचा था।

वो लम्हा जब मेरे बच्चे ने माँ पुकारा मुझे,
मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई।

जब भी देखा मेरे किरदार पे धब्बा कोई,
देर तक बैठ के तन्हाई में रोया कोई।
“मेरी माँ”

माँ की अजमत से अच्छा जाम क्या होगा,
माँ की खिदमत से अच्छा काम क्या होगा,
खुदा ने रख दी हो जिस के कदमों में जन्नत,
सोचो उसके सर का मुकाम क्या होगा।

Maa Shayari

कोई दुआ असर नहीं करती,
जब तक वो हम पर नजर नहीं करती,
हम उसकी खबर रखे न रखे,
वो कभी हमें बेखबर नहीं करती।

यूं ही नहीं गूंजती किलकारियां‬ घर आँगन‬ के कोने में,
जान ‎हथेली‬ पर रखनी‪ पड़ती है “माँ” को “‪माँ‬” होने में।

जब जब कागज पर लिखा, मैने “माँ” का नाम,
कलम अदब से बोल उठी, हो गये चारो धाम।

ऊपर जिसका अंत नहीं उसे “आसमां” कहते हैं,
इस जहाँ में जिसका अंत नहीं उसे “माँ” कहते हैं।

मेरी तक़दीर में कभी कोई गम नही होता,
अगर तक़दीर लिखने का हक़ मेरी माँ को होता।

मैं रात भर जन्नत की सैर करता रहा दोस्तो,
आँख खुली तो देखा मेरा सर माँ के गोद में था।

खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से,
बासी भी हो गई हैं, तो लज़्ज़त वही रही।

जिसके होने से मैं खुद को मुक्कम्मल मानता हूँ,
मेरे रब के बाद मैं बस अपनी माँ को जानता हूँ।

खूबसूरती की इंतहा बेपनाह देखी,
जब मैंने मुस्कुराती हुई माँ देखी।

दिल तोड़ना कभी नहीं आया मुझे,
प्यार करना जो सीखा है माँ से।

जन्नत का हर लम्हा, दीदार किया था,
गोद मे उठाकर जब माँ ने प्यार किया था।

कौन सी है वो चीज़ जो यहाँ नहीं मिलती,
सब कुछ मिल जाता है पर माँ नहीं मिलती।

तेरी डिब्बे की वो दो रोटिया कही बिकती नहीं
माँ मेंहगे होटलों में आज भी भूख मिटती नहीं

माँ तेरी याद सताती है मेरे पास आ जाओ,
थक गया हूँ मुझे अपने आँचल मे सुलाओ,
उंगलियाँ अपनी फेर कर बालो में मेरे,
एक बार फिर से बचपन कि लोरियां सुनाओ।

ठोकर न मार मुझे पत्थर नहीं हूँ मैं,
हैरत से न देख मुझे मंज़र नहीं हूँ मैं,
तेरी नज़रों में मेरी क़दर कुछ भी नहीं,
मेरी माँ से पूछ उसके लिए क्या नहीं हूँ मैं।

दिन की रौशनी ख्वाबो को बनाने मे गुजर गयी,
रात की नींद बच्चे को सुलाने मे गुजर गयी,
जिस मकान मे तेरे नाम की तख्ती भी नहीं है,
सारी उम्र उस मकान को बनाने मे गुजर गयी।

Maa Shayari

किताबों से निकल कर तितलियाँ ग़ज़लें सुनाती हैं,
टिफ़िन रखती है मेरी माँ तो बस्ता मुस्कुराता है।

कदम जब चूमले मंज़िल तो जज़्बा मुस्कुराता है,
दुआ लेकर चलो माँ की तो रस्ता मुस्कुराता है।

एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई…
मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है।

शायद यूँही सिमट सकें घर की ज़रूरतें,
‘तनवीर’ माँ के हाथ में अपनी कमाई दे।

दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूँ आरिफ़,
कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए।

इसलिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर,
मेरी शह-रग पे मेरी माँ की दुआ रखी थी।

ऐ रात मुझे माँ की तरह गोद में ले ले आज,
दिन भर की मशक़्क़त से बदन टूट रहा है।

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ सज़दे में रहती है।

चलती फिरती आँखों से अज़ाँ देखी है,
मैंने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है।

पहले ये काम बड़े प्यार से माँ करती थी,
अब हमें धूप जगाती है तो दुःख होता है।

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है,
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है।

भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को,
जब हुआ हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े।

मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं,
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़—ए—माँ रहने दिया।

शी में माँ, ग़म में माँ,
ज़िन्दगी के हर पहलू में माँ,
दर्द को भाप ले, आंसुओं को नाप ले,
ज़िन्दगी के हर कदम पर,
मुश्किलों को ढाक ले,
गोद में सुलाकर जब अपनी एक थाप दे,
दुनिया स्वर्ग लगे, माँ नींद में भी झांक ले,
जब भी तुझसे दूर जाऊं, माँ डर से कांप ले,
चोट जब मुझको लगे,
माँ दूरियों से माप ले,
माँ बस माँ एक ही नाम
हर कदम पर जाप ले..

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